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शरीर का मरना वास्तविक रूप में मरने का आखिरी पड़ाव है, इसके बाद कुछ भी नहीं मरता, इसके बाद बस चीज़ें जीवित होती है जैसे हमारे विचार, बाते और कर्म.
मैं जब अकेले रहता हूं तो मैं उन कुछ जीवित चीजों के बारे में सोचता हूं जो मैं इस विश्व को देकर जाऊंगा, और मैं हर बार शून्य विचार से खाली लौट जाता हूं, मेरे पास इस विश्व को इस किताब से अधिक देने मात्र कुछ नहीं है.
सिवाय इस किताब के शायद ही मैं कभी और कुछ इस विश्व को सौंप पाऊंगा मगर जितना मैं दे पाऊंगा उतना देकर जाऊंगा, ताकि मेरे मृत्यु के बाद भी लोग कह सके
' जो बीत जाता है, वो कहाँ जाता है? '

सप्रेम :
ऋषभ
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